इंटरव्यू/ Interview

राजकमल प्रकाशन समूह के ‘प्रकाशन समाचार’ के जून 2013 अंक में प्रकाशित मेरे साक्षात्कार का अविकल और असंपादित रूप :

Dushyant

समकालीन हिंदी आलोचकों को वॉलिंयटरी रिटायरमेंट ले लेना चाहिए


1. आप हिन्दी के सतत सक्रिय कलमकारों में से एक हैं। हम यहां जानना यह चाहते हैं कि एक लेखक के रूप में आपका जीवन किस विधा से आरम्भ हुआ?

मेरी पहली रचना तो शायद गीत रही होगी। पाकिस्तान की सीमा पर उत्तरी राजस्थान में घग्घर नदी के किनारे मेरा बचपन बीता है। पिता वहां सरकारी स्कूल में हैडमास्टर थे। उस समय रेडियो में फिल्मी गीत सुनकर वैसा लिखने का भाव पैदा हुआ। लिखना, नष्ट कर देना शुरूआती प्रक्रिया यही रही। शायद मुझमें कविता का बीज पडना यही था। उसी दौर में पिताजी ने बिज्जी की कहानियां पढकर सुनाईं, तो शब्दों के लिए अनुराग बढा।

2. आपकी पहली रचना क्या थी? वह कब लिखी गई और उसे किसने किस पत्रा-पत्रिका में प्रकाशित किया? उसके छपने पर सुधी पाठकों और परिचित-अपरिचित लेखकों से कैसी प्रतिक्रियाएं मिलीं और उस समय आपको कैसा लगा?

मेरी पहली प्रकाशित रचना बाल पत्रिका ‘बालहंस’ में कहानी थी। उसका मेहनताना मिला तो, पहली बार लगा -”अरे लिखने से पैसा भी मिलता है”। प्रतिक्रियाएं कोई खास नहीं मिली, हां, मेरे दादा ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। उसी आशीर्वाद से लेखक हूं शायद।

3. आपकी पहली प्रकाशित पुस्तक कौन-सी है, वह कब और किस प्रकाशन से प्रकाशित हुई? उसे हिन्दी के पाठक-लेखक संसार ने किस रूप में लिया?
अजीब से संयोग के तहत मेरी पहली किताब-”उठै है रेतराग ” राजस्थानी में कविताओं की 2005 में प्रकाशित हुई, उम्मीद से कहीं ज्यादा, मेरी कविताओं की औकात से बहुत बहुत ज्यादा उसे प्यार मिला, राजस्थानी अकादमी ने उसे पुरस्कार भी दिया। कई भाषाओं में कविताओं का अनुवाद हुआ। समकालीन भारतीय साहित्य में दो बार उस संग्रह से कविताएं आईं तो देशव्यापी प्रतिक्रियाएं मिलीं।

4. राजकमल प्रकाळान समूह यानी राधाकृष्ण, राजकमल और लोकभारती से आपका जुड़ाव कब हुआ? बहैसियत लेखक इनके साथ आपके अनुभव किस तरह के रहे?
एक किताब आ चुकी थी, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिसर्च फैलोशिप पर पीएच. डी. पूरा किया तो जेएनयू से मौखिकी लेने आए प्रो दिलबाग सिंह साहब ने जब काम की प्रशंसा की तो हौसला हुआ और बिना किसी परिचय के, बिना किसी मध्यस्थ के सीधे अशोक माहेश्वरी जी से संपर्क किया। खुश किस्मत रहा कि उन्होंने किताब की शक्ल देखकर कुछ दिनों में ही कह दिया कि हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं। हालांकि उसके बाद उनके और मेरे धीरज की परख होनी थी, नतीजा यह हुआ कि तकरीबन 6 साल लग गए। इस बीच मेरी दो और किताबें आ गईं। इस प्रक्रिया में और मेरे और अशोक जी के धीरज में एक और व्यक्ति ने कैटलिस्ट का काम किया, वे हैं आर. चेतन क्रांति।

राजकमल समूह के साथ अपने अनुभव को आपसे बांटने के लिए सूरदास याद आ रहे हैं, जिन्होंने कृष्ण की बालक्रीडाओं के लिए कहा था कि आंखों के जुबान नहीं है और जुबान के आंखें, मैं कैसे वर्णन करूं। वहीं बात मेरे साथ है दिल के पास शब्द नहीं और शब्दों के पास दिल।

5. हिन्दी समाज में लेखक और प्रकाळाक सम्बन्ध अकसर तनावपूर्ण रहते हैं। माना जाता है कि यह एक अनिवार्य स्थिति है। इस सम्बन्ध में आपके अनुभव कैसे रहे और इस स्थिति के बारे में क्या सोचते हैं?
. मेरे अनुभव मिले-जुले रहे हैं।
लेखक- प्रकाशक तनाव को अनिवार्य नहीं मानता हूं।
दो वजहें लगती हैं मुझे, एक- बोध से निकलना होगा जो दोनों ओर है, लेखक सोचता है कि मेरे काम पर प्रकाशक मौज कर रहे हैं, कमाई कर रहे हैं। दूसरी ओर प्रकाशक को लगता है, लिखने से क्या होता है, उसे छापकर अपने एक तंत्र के जरिए तो मैं लोगों तक पहुंचाता हूं। अवचेतन में इस बोध की उपस्थिति तनाव को जन्म देती है। दूसरा, पारदर्शिता जरूरी है कि कितनी किताबें छपी, कहां बिकीं, कितनी बिकीं। लेखक हिसाब मांगे, प्रकाशक जवाब ना दे तो संवाद टूटता है, गलतफहमियां बढती है, पहाड हो जाती हैं। अब तो आरटीआई का युग है, सरकारी खरीद तो वैसे भी नहीं छुप पाएगी, लेखक जान लेगा, कितनी किताबें किस पुस्तकालय में कितनी खरीदी गई हैं। तो समय बदल रहा है, प्रकाशक भी जान रहा है, स्थितियां बदल रही हैं। ज्यादा बेहतर हो कि मिलके तय करें- क्या छापना है, कितना छापना है, उसका प्रचार कैसे करना है, ब्रांडिंग कैसे करनी है, लाभ में हिंस्सा क्या होगा। बिजनेस का ढांचा तो सोचना पडेगा।

एक तयशुदा तारीख पर किताब रिलीज हो, जोरदार प्रचार हो, प्रचार के कई माध्यमों का एक साथ इस्तेमाल हो।
प्रचार में धन का जोखिम है, पर वह लेना होगा, रूपा ने चेतन भगत के लिए जोखिम लिया, वेस्टलेंड ने अमीश के लिए जोखिम लिया तो नतीजे निकले ना! बिना उस यौद्धिक प्रचार के निकट अतीत में ना तो ‘हैरी पॉटर’ इतना बिकता, ना मेयर की ‘टिवलाइट’ और ‘एक्लिप्स’, ना खालिद हुसैनी की ‘काइट रनर’।

हालांकि मैं मानता हूं कि अच्छी किताब समाज में अपनी जगह खुद बनाती है, और अच्छी किताब ही दूर तक जाती है, देर तक लोगों की पसंद बनती है, पर पर कई बार इस प्रक्रिया में सदियां बीत जाती है। नुकसान किताब का भी होता है, लेखक प्रकाशक का भी और उन सदियों के पाठकों का सबसे ज्यादा जो वंचित रहते हैं। उस किताब के समकालीन पाठकों तक उनके हित में, प्रकाशक के निवेशित धन के हित में, और लेखक के हित में तो समय पर, किताब पहुंचाने के लिए किसी किताब को पहले प्रचार और उसके बाद गुणवत्ता का होना लाजमी है।

यह कहना भी जरूरी है कि लेखकों का उत्साह दो चीजों से होता है, पहला पाठक से यानी उसका लिखा अधिकतम पाठकों तक पहुंचे, दूसरा रॉयल्टी से। लेखक को आर्थिक रूप से अगर कुछ नहीं मिल रहा तो वह पूरे मनोयोग से नहीं लिख सकता, यह तय है। उसका हित प्रकाशक और पाठक के हित के साथ जुडेगा तभी कुल मिलाकर सिनेरियो बदलेगा।

6. एक लेखक के रूप में सबसे ज्यादा सन्तोष आपको किस पुस्तक ने दिया और सबसे ज्यादा पाठक किस किताब को मिले? उसे प्रकाशित किसने किया?
बडा पाठक वर्ग तो राजकमल से प्रकाशित किताब से ही संभावित है, अभी जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, बहुत उत्साहजनक हैं।

7. इन दिनों आप क्या कर रहे हैं?
सुदीर्घ शोध के बाद इन दिनों राजकमल प्रकाशन के लिए कस्तूरबा गांधी की जीवनी लिख रहा हूं। इसके लिए अशोक जी ने असीम धैर्य का परिचय दिया है। विश्वास है कि उनका धीरज और मेरी मेहनत हिंदी पाठकों को कस्तूरबा पर एक अच्छी किताब के रूप में मिलेंगे।
अपने उपन्यास को आखिरी शक्ल देने का काम कर रहा हूं।
तीन उपन्यासिकाएं लंबित हैं, कुछ फिल्मी लेखन भी, कुछ अखबारी लेखन भी।
लेखन के हर माध्यम के लिए लिखना चाहता हूं, लिखता रहा हूं, लिखता रहूंगा। इतिहास में कुछ बहुत काम के विषयों पर लिखने का मन है। देखते हैं समय कितना अवसर देता है, और आजीविका के प्रश्नों के समाधान में अगर इस लेखन का हिस्सा नहीं होगा तो यकीन मानिए कायदे से, करीने से लेखन नहीं हो पाएगा। इसी में लगा रहता हूं कि पूरे मनोयोग से लिखूं, पार्टटाइमर की तरह नहीं।

8. आप किस विधा की पुस्तकें पढ़ना पसन्द करते हैं? इधर आपने क्या उल्लेखनीय पढ़ा?

अनुवाद बहुत पढता हूं। मुख्यत: फिक्शन। फिर नॉन फिक्शन में भी बहुत रूचि है। इन दिनों कुछ जर्मन उपन्यासों के अनुवाद पढ रहा हूं। खासकर माग्रिट श्राइनर के उपन्यास। बीच में, हाल ही कुछ चीनी और जापानी रचनाएं पढने का अवसर भी मिला। तमिल और मलयालम के कुछ उपन्यासों के अनुवाद भी मेरी टेबल पर हैं, देखता हूं, इस साल पढ पाया तो।

9. समकालीन आलोचना पर आप क्या कहना चाहेंगे?

मेरी राय में समकालीन हिंदी आलोचकों को वॉलिंयटरी रिटायरमेंट ले लेना चाहिए। वे ज्ञान के भंडार हैं, पर जो उनका काम है, वे वैसे ही नहीं कर रहे हैं, तो वे कुछ अन्य जरूरी तथा रचनात्मक काम करें, तो ज्यादा बेहतर होगा।

10. हिन्दी का ज्यादातर लेखन-प्रकाशन साहित्य-केन्द्रित होता है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इसी वजह से आज के हिन्दी पाठक की सारी पाठकीय जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं। क्या अब हमें साहित्य के अलावा स्वास्थ्य, कानून और प्रबन्धन आदि विषयों पर भी ध्यान नहीं देना चाहिए?

सौ फीसदी सहमत हूं। आप हमेशा खीर नहीं खा सकते। कभी मीठा, कभी नमकीन, कभी चटपटा …. तो केवल साहित्य केंद्रित हो जाना बडी त्रासदी है। मुझे लगता है कायदे से आत्मकथाएं, जीवनियां, आम पाठकों के लिए सहज सरल भाषा में दर्शन और इतिहास हिंदी में खूब लिखे जाने चाहिएं, अनुवाद भी हों। और यह काम परंपरागत हिंदी लेखकों के तो बस का नहीं है, नई खेप आनी जरूरी है।

11. पाठकों की कमी की शिकायत आज सभी प्रकाशक करते हैं। आप इस समस्या को कैसे देखते हैं और इसका क्या समाधान हो सकता है? आज के बाजारवादी दौर में हिन्दी प्रकाशन के सामने क्या चुनौतियां देख रहे हैं और इससे निपटने के लिए क्या करना चाहिए?
यह मानता हूं कि चुनौती तो है, बदलते समय में जब छोटे छोटे कस्बों के औसत छात्र जब अधकचरा ही सही, अंग्रेजी माध्यमों से पढकर निकल रहे हैं तो कैसे उम्ममीद करें कि वे हिंदी की किताब पढेंगे। बात में दोहराव लग सकता है पर इस तरह से भी कह लेने दीजिए कि हिंदी बेल्ट में टूटी- फूटी अंग्रेजी जानने सीखने वाले निम्न मध्यम वर्गीय पाठकों ने चेतन भगत खडा किया है ना साहब। उस पाठक वर्ग को कायदे से अंग्रेजी नहीं आती। इसी समय में यह संभव हुआ है, पुस्तकालयों और परंपरागत किताबों में उलझे हमारे हिंदी प्रकाशकों ने कभी उस पाठक वर्ग को टारगेट नहीं बनाया। वो पाठक वर्ग उनके हाथ से खिसक रहा है, हम सब मौन देख रहे हैं। जिला मुख्यालयों, तहसील, गांव के स्तर पर हिंदी बेल्ट में हिंदी का पाठक वर्ग अब भी है, जितना है, हिंदी की जितनी किताबें छपती हैं, उनकी बिक्री के लिए तो बहुत है, उसके लिए किताबें उपलब्ध नहीं है । वह किताबें डाक से नहीं मंगवाता, ऑन लाइन की परंपरा थोडी दूर है।

बेंगलोर में आईटी में कार्यरत मूलत: हिंदी बेल्ट के एक दोस्त को मैंने अंग्रेजी में मटो पढते पाया, मैंने पूछा- भले आदमी! तुम हिंदी जानते हो, हिंदुस्तानी जुबान में मंटो को पढा अपने मूल आनंद में। तो उसका जवाब था-‘ यार मंटो देवनागरी में मिला नहीं, अंग्रेजी वाला मिल गया तो खरीद लिया। ‘

प्रकाशकों को छोटे- छोटे आउटलेट बडे कॉलेजों में खेलने चाहिएं। लेखकों के साथ मिलकर प्रकाशन किताब और लेखक तीनों की ब्रांडिंग की योजना बने। कॉलेजों में जाने के कार्यक्रम हों। जैसे अंग्रेजी किताबों और फिल्मों का प्रमोशन होता है। नए किस्म के या नई पीढी के पाठकों के लिए किताबों की ऑन लाइन उपलब्धता को सुनिश्चित किया जए। हिंदी में भी हमें किताब के प्रिंट एडिशन के साथ ई-बुक यानी किंडल आदि फॉरमेट अपनाने होंगे।
मेरी सीमाएं हो सकती हैं पर किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर तीव्रता और आक्रामकता से वाजिब रूप से हिंदी किताबों का प्रचार नहीं देखता हूं।
प्रकाशकों की नजर में परंपरागत मार्केट ही पर्याप्त होते होंगे, पर बदलते सिनेरियो में नई चुनौतियों से लडने के लिए इंडीविजुअल पाठकों तक पहुंचना भी तो जरूरी है।
अब तक जो पाठक वर्ग माने जाते रहे हैं, उनसे इतर नए पाठक वर्ग की खोज और उन तक पहुंचने के मार्ग बनाना भी प्राथमिकता में होना चाहिए।

12. राजकमल अब एक समूह के रूप में सक्रिय हुआ है, भारतीय प्रकाशन के इतिहास में यह पहली ऐसी घटना है जब तीन बड़े प्रकाशन संस्थान, राजकमल, राधाकृष्ण और लोकभारती एक छतरी के नीचे काम कर रहे हैं। आप इसे किस रूप में देखते हैं?
प्रतीकात्मकता रूप से तो अच्छा ही है। और वास्तविक रूप में इसका सकारात्मक होना इसके कार्यो से ही होगा। तीनों प्रकाशन अलग जॉनर के साथ जुडें और एक दूसरे के पूरक बनें, ये चाहता भी हूं, शुभकामनाएं भी देता हूं।