जुलाई की एक रात – Published by Penguin !

july ki ek raat

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पेंगुइन से प्रकाशित  – 2013

हिंदी के बेहतरीन पत्र पत्रिकाओं जैसे परिकथा, नया ज्ञानोदय, कथादेश, वसुधा, बया, जनसत्ता और सन्मार्ग आदि में प्रकाशित और चर्चित आठ कहानियों सहित कुल पंद्रह कहानियों का संग्रह

इस किताब के बारे में

udayprakashदुष्यंत की कहानियां फ़कत इस अर्थ में विशिष्ट नहीं हैं कि वे हिंदी कहानियों की प्रचलित परंपरा से छिटकती हुई, अब तक प्रतिबंधित या वर्जित इलाकों में अद्भुत पठनीयता और उत्तेजना के साथ प्रवेश करती हैं, बल्कि वे जातीय, सामुदायिक और यौनिक टकराहटों को रोचकता और वैचारिकता के साथ पेश करती हैं। वे जोखिम भरी निडरता के साथ हिंदी के समकालीन कथा लेखन के सामने अनुभव, स्थापत्य, भाषा और शैली की नयी खिड़िकयां खोलती हैं। ग्लोबल कारपोरेट पूंजी और टेकनॉलाजी के असर से बदल चुके मूल्यों और मानवीय रिश्तों को उघाड़ती हुईं दुष्यंत की ये कहानियां उस उत्तर-आधुनिक वास्तविकताओं की किस्सागोई है, जब धर्म से लेकर राजनीति और पारिवारिक कठोर संविधानों को आज के युवा विदेशी एक्शन फिल्मों, कार रेस, घूंसेबाजी, हत्याओं, फरेब और तमाम स्पेशल इफेक्ट्स से भरे ठगी के तमाशे के बतौर देखने लगे हैं। ये किस्से तमाम तरह की पिछली मासूमियतों की मौत की खबर देती कहानियां हैं। कभी किसी लेखक ने कहा था कि अगर व्यक्ति और व्यक्ति के बीच हिंसा, व्यभिचार, चोरी, क्रूरता, ठगी, झूठ और धोखाधड़ी को वर्जित कर दिया जाय तो कोई रचना तो क्या, एक छोटी-सी टिप्पणी तक नहीं लिखी जा सकती। दुष्यंत अपनी कहानियों में आज के समय और यथार्थ पर मार्मिक और तीखी टिप्पणी भर नहीं करते बल्कि किसी किस्सा-गो के जादुई हुनर में पाठकों को बांध लेने वाली कहानियां, अपूर्व युवा वयस्कता के साथ प्रस्तुत करते हैं।

– उदयप्रकाश, हिंदी के सर्वाधिक चर्चित समकालीन कथाकार, किताब की भूमिका में

neelesh misraइस कहानी संग्रह में शॉपिंग मॉल वाला नया हिंदुस्तान भी है और गली मोहल्लों में धड़कने वाला अपना पुराना हिंदुस्तान भी। और इन दोनों के बीच कहीं, बदलते वक़्त के उजले, मटमैले रिश्ते।
– नीलेश मिश्रा, फिल्‍म लेखक और स्‍टोरीटेलर

Dr-Chandraprakash-Dwivedi-jpgये कहानियां जीवंतता और पठनीयता से ओतप्रोत हैं। दुष्यंत इन कहानियों के माध्‍यम से बडी सुंदरता से अपने वर्तमान का यथार्थ और समय का सच्‍चा इतिहास लिखते हैं, उनकी भाषा भी कहानी की भाव भूमि और कथ्य के अनुरूप और उपयुक्त है। जो किस्‍सागोई शिल्‍पगत प्रयोगों के अति मोह में नए हिंदी कहानीकारों में दुर्लभ सी हो गई है, दुष्‍यंत उसे सफलता के साथ सहेजते हैं।
– डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी, धारावाहिक ‘चाणक्य’ और फिल्म ‘पिंजर’ के निर्देशक

om-thanviदुष्यंत की कहानियां डायरी हो सकती थीं और एक उपन्यास के अनुच्छेद भी। अधिकांशतः शहरी जीवन के इर्द-गिर्द मंडराती उनकी कथा-वस्तु हमारे समक्ष आधुनिक जीवन के तनावों, अंतविर्रोधों और मानसिक-वैचारिक टकराव को खंगालती है। इन चीजों की छाया कहानियों की भाषा में भी देखी जा सकती है जो, कथा-रूप के अनुसार, किसी संवाद में उलझती-सुलझती अपना स्वरूप आप बनाती हैं। जैसा कि एक कहानी का समाहार है — समय के इस निरंतर संवाद को संभव है आप कहानी न मानें, पर यह अपने समय की कहानी है — समय जो सबसे छुपके रोने का है।”
– ओम थानवी, संपादक ‘जनसत्ता’

suraj_prakashदुष्‍यंत की कहानियों से गुज़रना मुझे हर बार दोहरे सुख से भर देता है। पहली बात जो मुझे उन कहानियों के बारे में बेहद अच्‍छी लगती है, वो ये है कि वे ग़ज़ब के किस्‍सागो हैं। हर पात्र के भीतर इतने गहरे तक उतर कर हमें उनकी दुनिया में इतने भीतर तक ले जाते हैं कि हमें लगता ही नहीं कि कहानी पढ़ रहे हैं। सब कुछ हमारे सामने घटित होता प्रतीत होने लगता है। दूसरी खास बात उनकी कहानियों की ये है कि उनकी कहानियां ओपन एंडेड हैं। जीवन की तरह प्रवाहमान। वे जहां कहानी जहां खत्‍म करते हैं, पाठक उस कहानी को वहीं से आगे बढ़ाता है। अपने अनुभव, अपनी सोच और अपनी कल्‍पना के अनुरूप। उनकी कहानियां नगरीय जीवन का जीता जागता दस्‍तावेज हैं।
– सूरजप्रकाश, जाने-माने कथाकार